मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए AI, ड्रोन और GIS का इस्तेमाल, 6 राज्यों ने पेश की रणनीति

नई दिल्ली, 5 अगस्त 2026: मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी, सामुदायिक भागीदारी और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया है। नई दिल्ली में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्श समिति की बैठक में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की रोकथाम, प्रभावी प्रबंधन और दीर्घकालिक सह-अस्तित्व पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। बैठक में बताया गया कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्वरूप रखता है। कई राज्यों में मानव-हाथी संघर्ष प्रमुख है, जबकि बाघ, तेंदुए, भालू, गैंडे, जंगली सूअर, जंगली भैंसे और बंदरों से जुड़े मामलों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल शुरू

बैठक में मानव-वन्यजीव संघर्ष उत्कृष्टता केंद्र और राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल की जानकारी दी गई। पोर्टल का उद्देश्य संघर्ष की घटनाओं की जानकारी दर्ज करना, डेटा प्रबंधन, ज्ञान साझा करना और निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना है।

समिति ने GIS, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रेडियो टेलीमेट्री और भविष्यसूचक विश्लेषण जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर भी चर्चा की। साथ ही त्वरित प्रतिक्रिया दल, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, पर्यावास सुधार और समय पर मुआवजा देने पर जोर दिया गया।

6 राज्यों ने साझा की रणनीति

असम, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के अपने उपाय प्रस्तुत किए। कर्नाटक ने AI आधारित निगरानी और डिजिटल मुआवजा प्रणाली पर जोर दिया, जबकि मध्य प्रदेश ने AI निगरानी, GPS ट्रैकिंग, ड्रोन और त्वरित प्रतिक्रिया दल को अपनी रणनीति में शामिल किया है।

उत्तराखंड ने 24×7 हेल्पलाइन, GPS ट्रैकिंग और सामुदायिक स्वयंसेवी नेटवर्क की जानकारी दी। उत्तर प्रदेश ने बताया कि राज्य में संघर्ष के अधिकांश मामले तेंदुओं से जुड़े हैं और तराई क्षेत्र प्रमुख प्रभावित क्षेत्र है। राज्य में त्वरित प्रतिक्रिया दल, सौर बाड़, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और बचाव केंद्रों के माध्यम से संघर्ष कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

बैठक में वैज्ञानिक प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और तकनीक आधारित निगरानी को मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रभावी समाधान के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।

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