भारत का मखाना बना ग्लोबल सुपरफूड, बिहार से दुनिया तक बढ़ा कारोबार; किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद

नई दिल्ली। कभी बिहार और पूर्वी भारत के पारंपरिक खाद्य पदार्थ के रूप में पहचाना जाने वाला मखाना अब तेजी से वैश्विक सुपरफूड का रूप ले रहा है। पोषण से भरपूर होने, स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और दुनिया में प्रीमियम स्नैक्स की मांग बढ़ने के कारण मखाना क्षेत्र का विस्तार लगातार हो रहा है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है। देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी करीब तीन-चौथाई है, जबकि वैश्विक आपूर्ति में बिहार की हिस्सेदारी लगभग 80 से 85 प्रतिशत बताई गई है। उत्तर बिहार के सुपौल, सहरसा और मधेपुरा समेत मिथिला और सीमांचल के कई क्षेत्रों में मखाने की खेती बड़े पैमाने पर होती है।

80 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा हुआ उत्पादन

2024-25 में भारत में मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन था। 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन पहुंच गया। इसी अवधि में बिहार का मखाना उत्पादन करीब 60,000 मीट्रिक टन रहा।

मखाना उत्पादन में आधुनिक तकनीकों और उन्नत किस्मों के इस्तेमाल से उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी किस्मों तथा फील्ड-सिस्टम खेती से उत्पादन क्षमता में सुधार की उम्मीद है।

476 करोड़ रुपये से मखाना क्षेत्र को मिलेगा बढ़ावा

मखाना क्षेत्र को व्यवस्थित और आधुनिक बनाने के लिए सरकार ने 2025-26 से 2030-31 तक 476.03 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी है। योजना के तहत गुणवत्तापूर्ण बीज, अनुसंधान, प्रशिक्षण, कटाई के बाद प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसका उद्देश्य मखाना की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना है।

'मिथिला मखाना' को मिला GI टैग

बिहार के मिथिला क्षेत्र में उत्पादित मखाने को 'मिथिला मखाना' GI टैग मिल चुका है। इससे क्षेत्रीय मखाने की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिला है। साथ ही घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी ब्रांडिंग की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं।

अमेरिका, कनाडा और UAE प्रमुख बाजार

भारत के मखाना निर्यात में अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख बाजार हैं। इन तीन देशों की हिस्सेदारी मिलाकर लगभग 77 प्रतिशत बताई गई है। इसके अलावा जर्मनी, नेपाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में भी मखाने को अपेक्षाकृत बेहतर कीमत मिल रही है।

2025-26 में भारत ने करीब 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका मूल्य लगभग ₹192.96 करोड़ रहा।

मखाना किसानों के लिए बढ़ते अवसर

मखाना केवल एक खाद्य उत्पाद नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। खेती के साथ सफाई, सुखाने, पॉपिंग, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और फ्लेवर्ड मखाना जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों के क्षेत्र में रोजगार और कारोबार की नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं।

सरकारी योजनाओं के तहत 2025-26 में देशभर में 8,159 किसान लाभान्वित हुए। मखाना उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन से जुड़ी तकनीकों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है।

स्वास्थ्यवर्धक स्नैक के रूप में बढ़ी मांग

मखाने में प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। कम वसा और कम सोडियम वाले इस खाद्य पदार्थ की मांग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच बढ़ रही है।

बढ़ती घरेलू खपत, प्रीमियम पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए मखाना बाजार के 2029-30 तक 11,000 से 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

भारत के लिए मखाना अब सिर्फ पारंपरिक फसल नहीं रह गया है। बेहतर तकनीक, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और निर्यात बाजारों के विस्तार के साथ यह किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण रोजगार पैदा करने और कृषि-खाद्य निर्यात को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण उत्पाद बन सकता है।

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