नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan ने रविवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में “विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन” विषय पर आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि जब विज्ञान और तकनीक पारंपरिक ज्ञान, भाषा, आस्था और संस्कृति के साथ जुड़ते हैं, तो यह जनजातीय समाज के सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बनते हैं। उन्होंने बताया कि भारत में करीब 1.4 लाख जनजातीय गांव हैं, जहां देश की लगभग 9 प्रतिशत आबादी निवास करती है।
उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदाय भारत की संस्कृति, परंपरा और जैव विविधता के संरक्षक हैं। इन समुदायों के पास सदियों पुराना पारंपरिक ज्ञान है, जो प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग में बेहद उपयोगी है।
उपराष्ट्रपति ने जनजातीय क्षेत्रों में हरित आर्थिक विकास की अपार संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने जनजातीय समुदायों के पारंपरिक हस्तशिल्प, वस्त्र और डिजाइन कौशल की सराहना करते हुए कहा कि यह विरासत पीढ़ियों से संरक्षित है और इसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई जा सकती है।
उन्होंने “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य का जिक्र करते हुए कहा कि इसका मूल मंत्र “विकास भी, विरासत भी” है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विकास और परंपरा का संतुलन ही देश को आगे ले जाएगा।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee को जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना के लिए याद किया और उनके योगदान को सराहा। साथ ही प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देने के प्रयासों की भी प्रशंसा की।
उन्होंने प्रधानमंत्री-जनमन योजना और धरती आभा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान जैसी सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि इनके तहत हजारों गांवों में सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।
कार्यक्रम में दिल्ली के उपराज्यपाल तरणजीत सिंह संधू, अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चौना मीन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे।
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