ईपीएफओ वेतन सीमा बढ़ोतरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को 4 माह में निर्णय का आदेश

11 वर्षों से नहीं बदली वेतन सीमा, अदालत ने जताई नाराजगी

नई दिल्ली। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) से जुड़ी वेतन सीमा में लंबे समय से बदलाव न होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह चार महीने के भीतर ईपीएफओ की वेतन सीमा बढ़ाने या न बढ़ाने पर स्पष्ट निर्णय ले।
2014 के बाद से नहीं हुआ कोई संशोधन

कोर्ट को बताया गया कि ईपीएफओ के अंतर्गत आने वाली अधिकतम वेतन सीमा वर्ष 2014 से ₹15,000 प्रतिमाह पर स्थिर है। जबकि इस दौरान महंगाई, वेतन संरचना और न्यूनतम मजदूरी में कई बार बदलाव हो चुका है। इसके बावजूद ईपीएफओ की वेतन सीमा में कोई संशोधन नहीं किया गया।

याचिका में क्या कहा गया

सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दाखिल जनहित याचिका में कहा गया कि वर्तमान वेतन सीमा के कारण लाखों कर्मचारी ईपीएफओ की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि 16वीं लोकसभा की लोक लेखा समिति और ईपीएफओ की सब-कमेटी (2022) ने वेतन सीमा बढ़ाने की सिफारिश की थी।

सिफारिशों के बावजूद केंद्र ने नहीं की कार्रवाई

कोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि जुलाई 2022 में केंद्रीय बोर्ड से मंजूरी मिलने के बावजूद केंद्र सरकार ने इन सिफारिशों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। याचिकाकर्ता के अनुसार, पिछले करीब 70 वर्षों में वेतन सीमा में नियमित और अनुपातिक संशोधन नहीं किया गया, जो कर्मचारियों के हितों के खिलाफ है।

कर्मचारियों को हो रहा नुकसान

अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि मौजूदा ₹15,000 की सीमा के कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी पेंशन, बीमा और भविष्य निधि जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे से बाहर रह जाते हैं। इससे संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के कर्मचारियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस एस. चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को समयबद्ध तरीके से फैसला लेना होगा, ताकि कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।

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