शंकराचार्य पद को लेकर विवाद: प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मांगा स्पष्टीकरण

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी को लेकर एक बार फिर विवाद चर्चा में है। प्रशासन ने उनसे यह स्पष्ट करने को कहा है कि वे किस आधार पर स्वयं को “शंकराचार्य” पद से संबोधित कर रहे हैं। इसको लेकर संत समाज और प्रशासन के बीच मतभेद सामने आए हैं।
प्रशासन का कहना है कि शंकराचार्य पद से संबंधित मामला न्यायालय में विचाराधीन है और जब तक कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक किसी भी व्यक्ति द्वारा इस पद का आधिकारिक रूप से उपयोग करने पर आपत्ति है। इसी क्रम में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जवाब मांगा गया है। प्रशासन का तर्क है कि यह कदम कानून व्यवस्था और विधिक प्रक्रिया के पालन के तहत उठाया गया है।
वहीं संत समाज और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थकों का कहना है कि शंकराचार्य पद कोई सरकारी नियुक्ति नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा और शास्त्रीय विधि से निर्धारित होता है। उनका तर्क है कि शंकराचार्य की मान्यता गुरु-परंपरा, मठ व्यवस्था और धर्माचार्यों के निर्णय से होती है, न कि किसी प्रशासनिक आदेश से। समर्थकों के अनुसार, धार्मिक पदों में प्रशासनिक हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक अधिकारों की सीमा कहां तक होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक व्यक्ति या पद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और संवैधानिक दायरे पर भी सवाल खड़े होते हैं।

फिलहाल, सभी की निगाहें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा दिए जाने वाले स्पष्टीकरण और आगे की प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि यह मामला संवाद से सुलझता है या फिर न्यायिक प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ता है।

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